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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

अर्जुन मुंडा का आत्मघाती खेल

झारखंडी नेताओं का कोई सानी नहीं है.बड़े अरमानों के साथ जब बिहार से अलग झारखंड प्रांत का श्रीगणेश हुआ तो माना ऐसा लगा कि प्रचुर श्रमशक्ति एवं वन-खनिज संपदा से परिपूर्ण इस उपेक्षित प्रक्षेत्र का निश्चित रूप से बेहतर कायाकल्प होगा.

लेकिन यह क्या? प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने जिस तरह से "डोमिसाइल" की नीति से यहाँ का ताना-बाना नष्ट किया और समूचे प्रदेश को हिंसा की आग में झोंक दिया था.उसका खामियाजा यहाँ के निरीह लोग आज भी भुगत रहे हैं.उसके आगे के मुख्यमंत्री में निर्दलीय मधु कोड़ा और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगीयों के रिकार्ड लूट की चर्चा मैं नहीं करना चाहूँगा क्योंकि उनमे प्रायः जेल में अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं.झारखंड आंदोलन के अगुआ माने जाने वाले नेता शिबू सोरेन की गुरूघंटालगीरी जग जाहिर है.

इधर तीसरी बार एक "बड़े कारपोरेट ग्रुप" की मदद से मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के राज्य में सीएनटी एक्ट को परिभाषित करते हुए जमीन खरीद-बिक्री को लेकर पिछले तीन दिनों तक जो नौटंकी चला और जिसका अभी स्थाई पटाक्षेप नहीं हुआ है.सिर्फ एक माह के लिये स्थगित हुआ है.वह प्रदेश को निश्चित तौर पर रसातल की ओर ले जायेगा और तीन-चौथाई आबादी के बीच आपसी भय-तनाव का माहौल जारी रखेगा.

तीन दिन पूर्व मुंडा सरकार के सचिव ने अचानक सभी जिला मुख्यालयों में अवस्थित भूमि निबंधन कार्यालय को यह लिखित नोटिश भेज दिया कि आदिवासीयों के साथ-साथ पिछड़े वर्ग के लोगों के किसी भी प्रकार के जमीन की खरीद-बिक्री अगड़े जाति के लोग नहीं कर सकते.इसका नतीजा यह हुआ कि राजधानी रांची से लेकर रामगढ़,हजारीबाग,धनबाद,बोकारो से लेकर जमशेदपुर कोडरमा तक निबंधन कार्य रुक गये.हर जगह धरना,प्रदर्शन,आगजनी,तोड़-फोड़ व हिंसा की घटनाएं होने लगी और ७२ घंटों तक ये निर्बाध जारी रहे.

उल्लेखनीय है कि ये सब उस दौरान हुए,जब प्रदेश में पंचायत चुनाव हो रहें है और समूचा प्रांत पेसा क़ानून के तहत हो रहे चुनाव के बीच नक्सली हिंसा की दंश झेल रहा है.वहरहाल,मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने उत्पन्न भीषण समस्या की नजाकत को समझते हुए अपने सचिव के आदेश को एक महीने के लिये स्थगित कर दिया है और कहा कि इसके भीतर समाधान ढूंढ लिया जायेगा.

वर्ष १९०८ यानि १०२ वर्ष पूर्व बने सीएनटी एक्ट की आज आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी क्या प्रासिंगता है ,यह समझ से परे है.यदि है भी तो आज इसका मूल्यांकन नये सिरे से करना जरूरी है. अब यहाँ के पिछडों की तो दूर आदिवासियों की हालत भी १०२ वर्ष पहले जैसा नहीं है.वे सब सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टिकोण से काफी परिपक्व हो गये हैं.वे भलीभांति समझने लगे हैं कि सीएनटी एक्ट उनके सर्वांगीण विकास में वाधक हैं.लेकिन दुर्भाग्य कि यहाँ के लूटेरे नेता वोट की राजनीति के चक्कर में ये नहीं समझ रहे है.

जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के इशारे पर ही सचिव ने जनमानस को नापने के ख्याल एक तरफ नोटिश जारी करवाये और राजनीतिक नज़रिया अपनाते हुये बाद में एक महीने का फौरिक स्थगन आदेश दे दिया है.इन सारे प्रकरण में मुंडा सरकार की नियत साफ़ नज़र नहीं आ रही है और उनके राजनीतिक जीवन सहित भाजपा के लिए भी आत्मघाती कदम साबित होगा,यदि इस समस्या का समुचित समाधान नहीं निकला तो.

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

अर्जुन मुंडा जी,आपका मुख्य सचिव पगला गया है क्या ?

शीर्षक पढ़कर चौंकिये मत. बात हम झारखंड के मुख्य सचिव ए.के.सिंह की कर रहे हैं.इस साहेब का कहना है कि राजधानी रांची के चारो ओर निर्माणाधीन करीब दो सौ फीट चौड़ी सड़क (रिंग रोड) को भविष्य में और चौड़ा करने के लिये दोनों ओर ३००-३०० फीट और भूमि अधिग्रहित की जायेगी. ३००-३०० फीट का अर्थ है कुल ६०० फीट यानि करीब-करीब आधा किलोमीटर चौड़ी सड़क.

अब ज़रा कल्पना कीजिये, रांची के चारों ओर जिन क्षेत्रों से होकर २०० फीट चौड़ी रिंग रोड बनाई जा रही है उसे हाल ही में अधिग्रहित की गई है और उसका अभी मुआवजा राशि का भुगतान की प्रक्रिया ही चल रही है.सरकार की इस अदूरदर्शी प्रक्रिया में हजारों लोग बेघर-बार हो चूके हैं.यदि इसके अलावे यदि पुनः ६०० फीट चौड़ा क्षेत्र अधिग्रहित किया गया तो शहरी क्षेत्र के लाखों लोग तो बेघर-बार तो होगें ही, गाँव के गाँव उजड़ जायेगें.

इस मुद्दे पर बिल्कुल असंवेदनशील समाचार पत्रों में खबर प्रकाशित होने के बाद प्रभावित क्षेत्रों में हडकंप मच गया है और लोग इतने गुस्से में हैं कि दो सौ फीट चौड़ी सड़क का निर्माण भी बाधित होनी तय है,यदि सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट न की.

झारखंड के नव पदास्थापित मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को चाहिये कि राज्य के मुख्य सचिव से अविलंब जबाव तलब कर अपनी सरकारी नीति तय करें कयोंकि विकास का अर्थ यह नहीं है कि उसका आधार मूलतः व्यापक विनाश हो और जहां विनाश होगा,वहाँ अपराध-उग्रवाद बढ़ेगा: जिसे रोक पाना काफी मुश्किल होगी.

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

देखिये झारखंड के सबसे पुराना अखबार दैनिक राँची एक्सप्रेस का हाल

यह सब देखने की राँची एक्सप्रेस के संपादक को फुर्सत नहीं!
आजकल झारखंड की राज्यधानी राँची से प्रकाशित समाचार पत्रों की स्थिति बहुत ही हास्यास्पद दिखती है.उसमे प्रकाशित सामग्रियों खासकर खबरों का आंकलन करने पर ऐ़सा प्रतीत होता है कि मानो उसमें क्या छापा-पढ़ायाजा रहा है,वह बिलकुल समझ से परे और भ्रामक नज़र आता है. अज़ीज आकार आज मैनें सरसरी निगाह से प्रांत का सबसे पुराना अखबार दैनिक “राँची एक्सप्रेस” का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ. इस अखबार में संपादकीय त्रुटियाँ इतनी है कि मन झल्ला उठता है.
प्रथम खबर को देखिये : संवाददाता ने महज कयास के आधार पर पिता को हत्यारा करार दे दिया है.इस खबर कीसूचना काफी प्रमुखता से मुख्यपृष्ठ पर भी छापी गई है.तथ्यों की पड़ताल व शीर्षक के आंकलन में संपादकीयविभाग की रामकहानी स्वतः वयां हो जाती है.
दूसरी खबर को देखिये: संवाददाता के अनुसार पारा शिक्षकों की हड़ताल १३वें दिन जारी है लेकिन,संपादकीयविभाग ने समाचार में ४३वें दिन करार दिया है.
प्रथम पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित अब तीसरे खबर का हाल देखिये: समाचार में प्राथमिकी दर्ज किये जाने केसूचना मायने रखते है जबकि,समाचार का शीर्षक समसमायिकता से इतर है.
राँची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के वरिष्ठ शिक्षक-प्रबुद्ध प्रधान संपादक बलबीर दत्त केमार्गदशन में प्रकाशित इस समाचार पत्र के आज के अंक में दर्जनों ऐसे खबर प्रकाशित हैं,जिसका विस्तार से उल्लेख किया जा सकता है.

रविवार, 22 अगस्त 2010

उग्र आंदोलन की ओर बढ़ रहे हैं विकास(राँची) से ओरमाँझी के बीच एन.एच.-33 के विस्थापित

विकास(राँची) से बरही(हजारीबाग) राष्ट्रीय उच्च मार्ग के फोर लेनिंग के क्रम में ओरमांझी प्रखंड मुख्यालय से सटेशास्त्री चौक(ब्लॉक चौक) भरी अनियामियता को लेकर माहौल काफी गर्म हो चुका है.

आज दिनांक 22/08/2010 समय दिन 12 बजे से राजधानी राँची जिले के ओरमांझी प्रखंड मुख्यालय के ठीक सामने पंचायत सचिवालय दडदाग में एन.एच-33 प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित जमीन-मकान मालिकों एवं प्रभावित व्यवसायियों की एक महत्वपूर्ण बैठक पूर्व सांसद व वरिष्ठ भाजपा नेता श्री रामटहल चौधरी ने की गयी,जिसमें निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गए:

1. एन.एच के अधिकारी प्रखंड मुख्यालय में आकार ग्रामीणों से बात कर अधिकरण के नियम स्पष्ट करे.

2. विकास(राँची) से बरही(हजारीबाग) के फॉर लेन सड़क निर्माण के लिए 80-85 फीट सड़क की आवश्यकता है जैसा कि अन्य फोरलेन सडकों के लिए अधिग्रहित किया गया है उतना ही जमीन विकास(राँची) से चूत्तूपालू के बीच भी अधिग्रहित किया जाय.जबकि मनमानी तरीके अपनाकर कहीं 150 तो कही 200 तो कहीं 300 फीट अधिकृत की जा रही है.

3. जिन व्यवसायियों का दूकान टूट रहा है,उन्हें समुचित मुआवजा व दूकान की व्यवस्था की जाय.

4. मकान में दी जा रही मुआवजा राशि में भारी अनियामियता बरती जा रही है,किसा प्रकार मुआवजा दी जा रही है , स्पष्ट हो.

5. मुआवजा राशि में 10% आयकर राशि काटी जा रही है,जो बिलकुल अनुचित है.

6। फॉर लेना सड़क के लिए कितनी जमीन अधिकृत की जा रही है, पीलर गाड़कर चिन्हित किया जाय,ताकि ग्रामीणों को पता चल सके।

7. एक सप्ताह के अंदर एन.एच.-33 के अधिकारी व जिला प्रशासन के अधिकारी प्रखंड परिसर में बैठक कर नियम व शर्तों की पूरी जानकारी देन, अन्यथा आठवें दिन प्रखंड कार्यालय का घेराव एवं नवमें दिन एन.एच.-33 जाम जाम कर दिया जाएगा.साथ ही आगे जो भी उग्र आंदोलन किये जायेगें, उसकी सा जबाबदेही प्रशासन व सरकार की होगी.

8. दिनांक 22/08/2010 के बाद कोई भी विस्थापित या प्रभावित लोग मुआवजा राशि नहीं लेगें, जबतक उपरोक्त बिंदुओं पर निर्णय नहीं हो जाता.

इस बैठक में मुख्यतः आदित्य साहू,लालू साहू,अमरनाथ चौधरी, रामदास साहू, ,रयुम अंसारी,लालबाबू साह,दिनेश साहू,राम नरेश महतो,महेंद्र साहू,प्रमोद कुमार,जयप्रकाश गुप्ता,अरविन्द कुमार,रामराज साह,राम नरेश बेदिया,लक्ष्मी साह,मनोज कुमार,दिनेश कुमार,शिवचरण साहू,डा.राज बल्लव सिंह,लक्ष्मी महतो,सुरेश महतो,अयोध्या साहू,अश्वनी कुमार,प्रेम नाथ मुंडा,चंदशेखर महतो,भोला साहू,हमीद अंसारी आदि समेत सैकड़ों लोग शरीक थे.

रविवार, 30 मई 2010

पत्थर माफियाओं के तांडव के बीच “तेलकटवा” गिरोह का आतंक

राजधानी राँची से सटे ओरमांझी प्रखंड के चूटूपालू क्षेत्र में जहां पत्थर(क्रेशर) माफियाओं का क्रूर तांडव जारी है,वे सरेआम प्राकृतिक सौंदर्य-वन संपदा को भ्रष्ट व निकम्मे शासन व्यवस्था की सांठ-गांठ से नष्ट कर रहे हैं,उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. दूसरी तरफ यहाँ एक और माफिया वर्ग ने अपनी जकड़ मजबूत कर ली है और वह वर्ग है स्थानीय पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से निजी तेल कंपनियों को भारी चूना लगानेवाला. गौर से देखिये इन चित्रों को. यह स्थान “तेलकटवा” गिरोह का एक प्रमुख जगह मानी जाती है.यहाँ तेल टैंकरों के ड्राईवरों को मामूली कीमत देकर या डरा-धमका कर भारी पैमाने पर डीजल/पेट्रोल की हेरा-फेरी की जाती है और माफियाओं द्वारा बाजारू कीमत से कम दर पर बेची जाती है. इन सबकी जानकारी तेल कंपनियों,उसके प्रतिनिधियों व पेट्रोलपंपों के मालिकों को होने के बाबजूद इस गोरखधंधे का दिन पर दिन फलते-फूलते जाना अनेक रहस्य भी प्रकट करतें है.

सोमवार, 24 मई 2010

झारखंड में गैरभाजपाई सरकार के सात फार्मूले

राँची:भाजपा द्वारा आज दोपहर शिबू सरकार से अपना समर्थन वापस लेने के वाद झारखंड के राज्यपाल ने झामुमो के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन को आज शाम साढ़े पांच बजे राज भवन बुलाया और एक सप्ताह के भीतर बहुमत साबित करने को कहा.श्री सोरेन गैर भाजपाई दलों के सहारे बहुमत साबित कर लेने का दावा किया है.विश्लेषकों के अनुसार झारखंड में गैरभाजपाई सरकार के गठन या समर्थन के फिलहाल निम्न सात फार्मूले नज़र आते हैं :

भाजपा-झामुमो में आज ११:३० बजे होगा तलाक

रांची : पिछले करीव एक माह से चल रही झारखंड मुक्ति मोर्चा की नौटंकी से अजीज आकार भारतीय जनता पार्टी ने शिबू सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है.प्राप्त जानकारी के अनुसार केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर आज दिन सोमवार को ११:३० बजे प्रदेश भाजपा के नेता उपमुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में राज्यपाल एमओएच फारूख से मिल कर समर्थन वापसी का पत्र सौंपेगें. बकौल वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा,फैसला हो गया है.करीव १० बजे पार्टी के सभी विधायक प्रदेश भाजपा कार्यालय पहुंचेगें.११:०० बजे के बाद चार माह पुरानी शिबू सरकार अल्पमत में आ जायेगी. उधर झामुमो के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन बोकारो में कहा कि वे भाजपा के समर्थन के बाबजूद इस्तीफ़ा नहीं देगें और सरकार बचाए रखने की संभावनाएं अंतिम क्षण तक तलाशेगें.कहा जाता है कि उनका कांग्रेस के साथ अंदरूनी समझौता हो गया है और कांग्रेस के १४,आजसू के ५,राजद के ५ तथा ४ निर्दलिय विधायकों के साथ सरकार में समर्थन जुटा लेगें. उल्लेखनीय है कि झामुमो के कुल १८ विधायक हैं.जो कुल मिलकर बहुमत पर है. हालांकि इस सरकार को बचाने या शामिल होने का उसे यह खामियाजा भुगतना पड़ेगा कि उसके गठबंधन में शामिल झाविमो से तलाक हो जायेगा

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

झारखंड में चल रहा है हाई वोल्टेज सियासी ड्रामा

झारखंड का सियासी ड्रामा लगातार उलझता ही जा रहा है। कट मोशन पर संसद में यूपीए सरकार के पक्ष मे शिबू सोरेन द्वारा वोट डालने से नाराज बीजेपी ने बुधवार को आनन-फानन में सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर डाली थी। लेकिन, अभी 24 घंटे भी नहीं बीते कि बीजेपी अपने फैसले पर पुनर्विचार करते नजर आ रही है। गुरुवार को बीजेपी ने सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेने के फैसले को फिलहाल टाल दिया है। अब बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व झारखंड के विधायकों से बात करने के बाद ही अंतिम फैसला लेगा। इस बीच शिबू सोरेन के बेटे ने बीजेपी से माफी मांग ली है और कहा है कि हम अब भी एनडीए के साथ हैं। दूसरी ओर, यह भी खबर आ रही है कि झारखंड का अगला सीएम बीजेपी का भी हो सकता है। बीजेपी ने झारखंड में शिबू सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापसी का फैसला गुरुवार को टाल दिया। बीजेपी नेता निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गुरुवार को सुबह 11 बजे राज्यपाल एम. ओ. एच. फारुख से मिलने नहीं पहुंचे। इससे पहले पार्टी ने कटौती प्रस्ताव पर केंद्र सरकार का समर्थन करने वाले सोरेन की सरकार से अलग होने का फैसला किया था। हेमंत सोरेन ने अपने पिता शिबू सोरेन के कट मोशन के पक्ष में संसद में यूपीए सरकार के पक्ष में वोट देने के बारे में बीजेपी के सीनियर नेताओं को सफाई दी। उन्होंने अपने पिता की तरफ से मांफी भी मांग ली। बीजेपी नेतृत्व हेमंत सोरेन की सफाई से संतुष्ट है। इसके बाद बीजेपी ने अपने पिछले फैसले को फिलहाल टाल दिया है। सूत्रों के मुताबिक अब इस बात की चर्चा चल रही है कि अगली सरकार का स्वरूप क्या होगा। ऐसी संभावना भी व्यक्त की जा रही है कि सीएम बीजेपी का हो सकता है और हेमंत सोरेन को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है। बीजेपी की ओर से कई लोग सीएम की दौड़ में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा सीएम की दौड़ में सबसे आगे हैं।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मैदान छोड़ कहाँ भागे बाबूलाल मरांडी ?

झारखंड की राजनीति में झाविमो (झारखंड विकास मोर्चा) के संस्थापक अध्यक्ष व सांसद बाबूलाल मरांडी का कोई सानी नहीं है."आपने रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था "वाली कहावत सुनी होगी.श्री मरांडी पहले भी कई मौकों पर ये कहावत चरितार्थ कर चुके है.यदि हम झारखण्ड में आज उत्पन्न ताजा हालात का विश्लेषण करते हैं तो भी वे ही कहावत याद आते है.
वेशक आज झारखण्ड प्रदेश के हालात काफी भयावह है.समूची शासन व्यवस्था नक्सल माफियाओं के हाथ में है.भाजपा-आजसू-जदयू के साथ असहज गठबंधन के बल सत्तासीन झामुमो की "शिबू सरकार" हर मोर्चे पर विफल और सिर्फ खाऊ-कमाऊ साबित है.उधर प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस आपस में ही जूतम-पैजार करते नजर आ रही है.इस दल में जितने नेता है,उतने ही गुट. कोई किसी को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. केन्द्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय भी मात्र हवाई नेता बने हुये है.
ऐसे में झाविमो के बाबूलाल मरांडी की जिम्मेदारी-जबाबदेही काफी बढ़ जाती है. विगत विधानसभा चुनाव में आम जनता ने जिस तरह से उन्हें समर्थन दिया है,उस आलोक में श्री मरांडी एक लापरवाह नेता के रूप में स्पष्ट होते है.जानकार बतातें है कि वे एक लंबे अरसे से विदेश दौरे पर है. वहाँ क्या कर रहे है,किसी को पता नहीं.कहा जाता है कि वे अभी कुछ और समय विदेश में ही रहना चाहते हैं ताकि,उन्हें झारखंड की ताजातरीन वदहाल सूरत का सामना न करना पड़े.

रविवार, 4 अप्रैल 2010

ढलती उम्र में सठिया गयें हैं शिबू सोरेन

झारखण्ड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन सठिया गए है.उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है.मुख्यमंत्री बनने के पहले वे सांसद थे.मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें छः माह के भीतर विधानसभा की सदस्यता ग्रहण करनी संवैधानिक वाध्यता है.लेकिन तीन माह से ऊपर हो रहे हैं,वे चुनाव लड़ने की बाबत कभी दुमका,कभी जामा तो कभी तोरपा सीट को लेकर पेंडुलम की तरह डोल रहे है.कहते हैं कि पिछली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से एक निर्दलीय प्रत्याशी राजा पीटर से परास्त हुये थे,उस हर का भूत उन्हें छोड़ने का नाम नहीं ले रहा. आजादी के इतने वर्षों बाद भी जंगली जीवन जीने को अभिशप्त आदिवासी समुदाय के एक बड़े तबके के बीच "दिशोम गुरू"के नाम से शुमार श्री सोरेन अपने प्रदेश में नक्सलवाद की कोई समस्या नहीं मानते है और खुद को सबसे बड़ा नक्सली बताते है.उन्हें ग्रीनहंट की कोई जानकारी नहीं है.गरीवों को सरकारी भीख के सहारे जीने वाला भीखारी बतातें है और कहतें है कि उनकी सरकार किसी को देने वाला कुछ भी नहीं है.

अंधेर नगरी चौपट राजा यानि नक्सली मुख्यमंत्री शिबू सोरेन

झारखण्ड में नक्सलवाद कोई समस्या नहीं.सब दुष्प्रचार.ई ग्रीनहंट क्या है? :शिबू सोरेन
सच पूछिये तो आज समूचे झारखण्ड प्रदेश में नक्सलियों का राज है.नक्सलियों के खिलाफ केंद्र व राज्य सरकार की की संयुक्त मुहिम "ग्रीन हंट" जैसी कारवाई का भी कोई खास असर देखने को नहीं मिल रही है.एक स्थानीय दैनिक समाचार पत्र के अनुसार प्रदेश में करीव २०० करोड़ रूपये की सरकारी योजना नक्सली आतंक के कारण ठप्प है.नक्सली संगठनें प्रति वर्ष करीव १०० करोड़ लेवी वसूल रहे हैं. इससे इतर झारखण्ड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का कहना है कि प्रदेश में कोई नक्सली समस्या नहीं है.सब दुष्प्रचार कर रहा है.कभी उन्हें भी नक्सली कहा जाता था.यही नहीं आजादी के इतने वर्षों वाद भी जंगली जीवन जीने को अभिशप्त बहुसंख्यक आदिवासी समुदाय को बदनाम करने की "साजिश" करार देते हुए अपने समर्थकों के बीच "दिशोम गुरू"के नाम से शुमार श्री सोरेन का कहना है कि नक्सलियों के विरूद्ध जारी अभियान "ग्रीनहंट" चल रही है,उसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है. वेशक आज झारखण्ड की स्थिति अंधेर नगरी तथा शिबू सोरेन की स्थिति चौपट राजा जैसी है,जो प्रचुर खनिज संपदा और मनोरम प्राकृतिक सौंदर्य की इस धरती के लिये एक अभिशाप से कम नहीं है.